द्वारका में आयोजित चर्चा में परिवार, समाज और पर्यावरण पर गूंजे विचार, युवाओं की सक्रिय भागीदारी
नई दिल्ली, 24 अप्रैल। विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर द्वारका स्थित साहित्य परिक्रमा कार्यालय में ‘पंच परिवर्तन’ पुस्तक पर एक चर्चा का आयोजन किया गया। साहित्य परिक्रमा टोली द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में साहित्यकारों, शिक्षाविदों, विचारकों और युवाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम में मुकुल कानिटकर द्वारा लिखित तथा सुरुचि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘पंच परिवर्तन’ पर आयोजित चर्चा में परिवार, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्रीय कर्तव्य और स्व-बोध जैसे पाँच प्रमुख विषयों पर गंभीर एवं सार्थक विमर्श हुआ।
चर्चा का केंद्रीय भाव सकारात्मक बदलाव पर आधारित रहा, जिसमें वैश्विक और मानवीय दृष्टिकोण को प्रमुखता दी गई। मुख्य वक्ता माननीय मनोज कुमार , संगठन मंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद ने कहा कि यह पुस्तक केवल भारत ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के कल्याण की सोच प्रस्तुत करती है। उन्होंने परिवार में संवाद की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि संवाद से ही संबंध, संस्कार और समाधान जन्म लेते हैं।
राष्ट्रीय कर्तव्यों पर विचार रखते हुए उन्होंने पुस्तक में व्यक्त इस भाव को रेखांकित किया कि “अधिकार मांगने वाला मंगता होता है और कर्तव्य निभाने वाला देवता समान होता है”—अब यह हमें तय करना है कि हमें मांगने वाला बनना है या देने वाला। उन्होंने कहा कि भारत का राष्ट्रीय स्वभाव अध्यात्म पर आधारित है और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना समस्त मानवता के कल्याण का संदेश देती है।
द्वारका के नगर बौद्धिक प्रमुख प्रवीण ने सामाजिक कुरीतियों को त्यागकर सकारात्मक बदलाव अपनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने भारतीय संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर बल दिया। साथ ही दिखावे के नाम पर पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर चिंता जताई। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर पूनम राठी ने कहा कि परिवर्तन की शुरुआत घर से होती है और परिवार ही संस्कारों की पहली पाठशाला है। उन्होंने सोशल मीडिया के कारण परिवारों में बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त करते हुए ‘मोबाइल पार्किंग’ जैसे प्रयोग अपनाने की सलाह दी। अदिति महाविद्यालय की प्राचार्या प्रोफेसर नीलम राठी ने परिवार को संस्कारों की जड़ बताते हुए सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय कर्तव्यों को जीवन में उतारने की बात कही।
उषा रानी ने प्लास्टिक और पॉलिथीन के कम उपयोग पर जोर दिया। शोधार्थी मनीष ने इतिहास के अध्ययन को आत्मबोध का माध्यम बताया, वहीं साहित्य परिक्रमा की प्रबंध निदेशक रजनी मान ने पुस्तक में वर्णित फार्मूला फ्रॉम विक्टिम हुड टू विक्ट्री हुड पर बात की।
अदिति महाविद्यालय की छात्रा श्वेता सिंह ने पंच परिवर्तन पुस्तक में वर्णित स्व -बोध के लिए छह “भ “ और स्वदेशी का मंत्र- भाषा ,भूषा,भजन, भवन , भोजन , भ्रमण पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी बड़े परिवर्तन की शुरुआत व्यक्ति और परिवार से ही होती है। ‘पंच परिवर्तन’ के सिद्धांतों को जीवन में उतारकर ही विकसित भारत 2047 का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। अंत में नीलम राठी द्वारा आभार व्यक्त किया गया और ‘पढ़ोगे तो रास्ता पाओगे’ के संदेश के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
इस अवसर पर डॉ विनीता कुमारी, श्री विकास, उषा, अदिति महाविद्यालय की छात्रा निशु ,अंशिका, प्रिया, श्रुति ,प्रिया, रिद्धि मिश्रा तथा साहित्य परिक्रमा की टोली के सदस्य इत्यादि भी मौजूद रहे।
‘पंच परिवर्तन’ के पांच सूत्र’:
चर्चा में पांच प्रमुख बिंदुओं को जीवन में अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया— परिवार:संवाद, संस्कार और बुजुर्गों का सम्मान
सामाजिक समरसता: जाति-धर्म से ऊपर उठकर समानता
पर्यावरण संरक्षण: प्लास्टिक मुक्त जीवन और प्रकृति का संरक्षण
नागरिक कर्तव्य: कर्तव्यनिष्ठा और स्वाभिमान
स्व -बोध- अपने अस्तित्व संस्कृति और पहचान को समझना
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